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लिम्फोमा किसी भी उम्र में हो सकता है; हालाँकि, यह युवा वयस्कों और 60 वर्ष से अधिक उम्र के वयस्कों में अधिक आम है। ज्यादातर मामलों में, लिम्फोमा का सफलतापूर्वक इलाज किया जा सकता है।
लिम्फोमा एक प्रकार का रक्त कैंसर है जो लिम्फैटिक सिस्टम (लसीका प्रणाली) में मौजूद लिम्फोसाइट्स में शुरू होता है। चूंकि इस प्रकार का कैंसर लिम्फोसाइट्स में शुरू होता है, यह शरीर की संक्रमण से लड़ने की क्षमता और शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली से जुड़े अन्य कार्यों को प्रभावित करता है।
लिम्फोमा आमतौर पर लिम्फ नोड्स, स्प्लीन (प्लीहा), थाइमस, बोन मैरो (अस्थि मज्जा) और अन्य अंगों में बनते हैं, और अंततः वे ट्यूमर बन जाते हैं। कुछ लिम्फोमा तेजी से बढ़ते हैं, जबकि कुछ धीमी गति से बढ़ते हैं और इसके उन्नत चरणों तक कोई लक्षण नहीं होते हैं। लिम्फोमा किसी भी उम्र में हो सकता है; हालाँकि, यह युवा वयस्कों और 60 वर्ष से अधिक उम्र के वयस्कों में अधिक आम है।
ज्यादातर मामलों में, लिम्फोमा का सफलतापूर्वक इलाज किया जा सकता हैं।
लिम्फोमा मुख्य रूप से दो प्रकार के होते हैं :
हॉजकिन्स लिम्फोमा दुर्लभ प्रकार का लिम्फोमा होता है। यह आमतौर पर बोन मैरो (अस्थि मज्जा) में मौजूद बी-लिम्फोसाइट्स में बनता है। हॉजकिन्स लिम्फोमा को आरएस सेल्स (कोशिकाओं) की उपस्थिति विशिष्ट बनाती है। आरएस सेल्स (कोशिकाएं), या रीड-स्टर्नबर्ग (सेल्स (कोशिकाएं), असामान्य, विशाल सेल्स (कोशिकाएं) होती हैं जो हॉजकिन्स लिम्फोमा के मरीज़ों के रक्त के नमूनों में पाई जाती हैं।
नॉन - हॉजकिन्स लिम्फोमा यह लिम्फोमा का सबसे आम प्रकार है। नॉन - हॉजकिन्स लिम्फोमा को आरएस सेल्स (कोशिकाओं) की अनुपस्थिति विशिष्ट बनाती है। नॉन - हॉजकिन्स लिम्फोमा वृद्ध वयस्कों में अधिक आम है।
लिम्फोमा शुरुआती चरणों में कोई भी लक्षण पैदा नहीं कर सकता है, और अगर वे कोई भी लक्षण पैदा करते भी हैं, तो वे विशेष नहीं होते हैं और अन्य किसी भी कम गंभीर स्वास्थ्य स्थितियों से जुड़े होते हैं :
लिम्फोमा के निम्नलिखित लक्षण हैं जिन्हें अनदेखा नहीं किया जाना चाहिए :
कई बार ये लक्षण अन्य बीमारियों के कारण भी हो सकते हैं। इसलिए, एक निश्चित निदान के लिए, कृपया डॉक्टर से परामर्श लें।
शोधकर्ताओं ने लिम्फोमा के जोखिम कारकों के रूप में निम्नलिखित कारकों की पहचान की है :
नॉन - हॉजकिन्स लिम्फोमा वृद्ध वयस्कों (60 और उससे अधिक उम्र के लोगों) में अधिक आम है। दूसरी ओर, हॉजकिन्स लिम्फोमा युवा वयस्कों और 55 साल से अधिक उम्र के वयस्कों में अधिक आम है।
महिलाओं की तुलना में पुरुषों में लिम्फोमा की संख्या अधिक बताई जाती है। फिर भी, लिम्फोमा के कुछ उपप्रकार महिलाओं में अधिक सामान्य हैं। /p>
एचआईवी, अंग प्रत्यारोपण या कोई अन्य विकार जो प्रतिरक्षा प्रणाली को कमजोर करते है जैसे की इम्यूनोडिफीसिअन्सी विकार, इसके कारण जिन लोगों की प्रतिरक्षा प्रणाली कमजोर होती है उन लोगों में लिम्फोमा होने का जोखिम अधिक होता है।
जिन लोगों को कुछ ऑटोइम्यून विकार हैं, जैसे रूमेटाइड आर्थराइटिस, ल्यूपस, सीलिएक डिजीज या सजोग्रेन सिंड्रोम, उन लोगों में लिम्फोमा विकसित होने का जोखिम अधिक होता है।
कुछ विशिष्ट वायरल संक्रमण, जैसे एपस्टीन-बार, हेपेटाइटिस सी और ह्युमन टी-सेल ल्यूकेमिया / लिम्फोमा (एचटीएलवी-1) लिम्फोमा के जोखिम को बढ़ाते हैं।
किसी करीबी रिश्तेदार को लिम्फोमा होने से, लिम्फोमा होने का खतरा बढ़ सकता है।
जिन लोगों ने पहले लिम्फोमा का इलाज कराया है उनमें दोबारा लिम्फोमा होने का जोखिम अधिक होता है।
जो लोग अक्सर बेंजीन, कीटनाशकों, तृणनाशकों आदि जैसे हानिकारक रसायनों के संपर्क में आते हैं, उनमें लिम्फोमा होने का खतरा अधिक होता है।
जिन लोगों ने अन्य कैंसर के उपचार के लिए रेडिएशन थेरेपी (विकिरण चिकित्सा) प्राप्त कि है उनमें भी लिम्फोमा विकसित होने का जोखिम बढ़ जाता है।
अगर किसी व्यक्ति को लिम्फोमा के लक्षणों का सामना करना पड़ रहा है तो डॉक्टर द्वारा सबसे पहले मेडिकल हिस्ट्री असेसमेंट (चिकित्सा इतिहास का अवलोकन) और शारीरीक परीक्षण का सुझाव दिया जाता है। इस दौरान डॉक्टर लक्षणों के कारण को समझने के लिए मरीज़ की पिछली और वर्तमान चिकित्सा स्थिति, सर्जरी का इतिहास, एलर्जी से संबंधित समस्याओं के बारे में जानकारी प्राप्त करने का प्रयास करते है। इसके अलावा, वह लिम्फोमा के संकेतों जैसे की नोड्स में सूजन, एनीमिया, त्वचा पर चकत्ते आदि के लिए मरीज़ की शारीरिक जांच कर सकते है।
विभिन्न रक्त सेल्स (कोशिकाओं) की संख्या निर्धारित करने के लिए रक्त परीक्षण की सिफारिश की जाती है। लाल रक्त सेल्स (कोशिकाओं), सफेद रक्त सेल्स (कोशिकाओं) या प्लेटलेट्स का निम्न स्तर लिम्फोमा का संकेत दे सकता है। हालांकि, लिम्फोमा के निदान के लिए केवल रक्त परीक्षण का उपयोग नहीं किया जाता है।
लिम्फ नोड बायोप्सी के दौरान, डॉक्टर एक लिम्फ नोड या उसके एक हिस्से को निकाल लेते है, और लिम्फोमा सेल्स (कोशिकाओं) की उपस्थिति के लिए माइक्रोस्कोप के तहत इस नमूने की जांच की जाती है। यदि लिम्फोमा सेल्स (कोशिकाएं) पाई जाती हैं, तो डॉक्टर द्वारा अतिरिक्त परीक्षणों की सिफारिश की जाती है।
बोन मैरो (अस्थि मज्जा) एस्पिरेशन और बायोप्सी के दौरान मरीज़ के कूल्हे की हड्डी में सुई डालकर बोन मैरो (अस्थि मज्जा) के तरल भाग (एस्पिरेशन) या ठोस हिस्से (बायोप्सी) को इकठ्ठा किया जाता है। बाद में, लिम्फोमा सेल्स (कोशिकाओं) की उपस्थिति के लिए इन नमूनों की माइक्रोस्कोप के तहत जांच की जाती है।
स्थिति से संबंधित अतिरिक्त जानकारी प्राप्त करने के लिए डॉक्टर द्वारा विभिन्न इमेजिंग टेस्ट की सिफारिश की जाती है। सामान्य रुप से सिफारिश किए जाने वाले इमेजिंग परीक्षणों में पेट / सीटी स्कैन, एमआरआई स्कैन आदि शामिल हैं। लिम्फोमा का निदान करने के लिए कैंसर बायोमार्कर के स्तर का आकलन करने और विशिष्ट जीन की उपस्थिति की जांच करने के लिए इम्यूनोफेनोटाइपिंग, फ्लो साइटोमेट्री, फिश परीक्षण आदि जैसे अतिरिक्त परीक्षण की सिफारिश की जाती है।
लिम्फोमा के लिए उपचार की योजना कई कारकों पर विचार करके बनाई जाती है, जैसे कि लिम्फोमा का प्रकार, इसका उपप्रकार, रोग का चरण, मरीज़ की उम्र, मरीज़ की कुल स्वास्थ्य स्थिति और किसी अंतर्निहित चिकित्सा स्थिति की मौजूदगी आदि।
लिम्फोमा के लिए प्रमुख रूप से अनुशंसित उपचार योजनाओं में कीमोथेरेपी, रेडिएशन थेरेपी (विकिरण चिकित्सा), बोन मैरो ट्रांसप्लांटेशन (अस्थि मज्जा प्रत्यारोपण), टार्गेटेड थेरेपी (लक्षित चिकित्सा) और इम्यूनोथेरेपी शामिल हैं।
धीमी गति से बढ़ने वाले कैंसर के मामले में, सक्रिय निगरानी की सिफारिश की जा सकती है, जिसमें डॉक्टर रोग के बढ़ने के संकेतों के लिए मरीज़ की निगरानी करेंगे। एक बार जब बीमारी के लक्षण दिखाई देने लगते है और मरीज़ की दिन-प्रतिदिन की गतिविधियों को प्रभावित करने लगते है तो डॉक्टर उपचार की सिफारिश कर सकते हैं।
कीमोथेरेपी के दौरान, लिम्फोमा सेल्स (कोशिकाओं) को नष्ट करने के लिए शक्तिशाली एंटीकैंसर दवाओं की उच्च खुराक दी जाती हैं। कीमोथैरेपी एक सिस्टमिक थेरेपी (प्रणालीगत चिकित्सा) है, यानी सर्जरी या रेडिएशन थेरेपी (विकिरण चिकित्सा) के विपरीत, यह पूरे शरीर में कैंसर सेल्स (कोशिकाओं) का इलाज करती है। यह लिम्फोमा के लिए उपचार की मुख्य पंक्ति है। रोग की गंभीरता के आधार पर इसे अन्य उपचार विकल्पों के साथ संयोजित किया जा सकता है या संयोजित नहीं किया जा सकता है।
रेडिएशन थेरेपी (विकिरण चिकित्सा) के दौरान, विशिष्ट क्षेत्रों में कैंसर सेल्स (कोशिकाओं) को नष्ट करने के लिए हाई – एनर्जी रेडिएशन बीम (उच्च-ऊर्जा विकिरण बीम), जो एक्स-रे या प्रोटॉन बीम हो सकते हैं, उसका उपयोग किया जाता है। लिम्फोमा के मामले में, लिम्फोमा सेल्स (कोशिकाएं) जो लिम्फ नोड्स या किसी विशिष्ट अंगों में जमा होती हैं उनको नष्ट करने के लिए रेडिएशन थेरेपी (विकिरण चिकित्सा) दी जाती है।
रेडिएशन थेरेपी (विकिरण चिकित्सा) के दौरान, विशिष्ट क्षेत्रों में कैंसर सेल्स (कोशिकाओं) को नष्ट करने के लिए हाई – एनर्जी रेडिएशन बीम (उच्च-ऊर्जा विकिरण बीम), जो एक्स-रे या प्रोटॉन बीम हो सकते हैं, उसका उपयोग किया जाता है। लिम्फोमा के मामले में, लिम्फोमा सेल्स (कोशिकाएं) जो लिम्फ नोड्स या किसी विशिष्ट अंगों में जमा होती हैं उनको नष्ट करने के लिए रेडिएशन थेरेपी (विकिरण चिकित्सा) दी जाती है।
हालांकि स्टेम सेल ट्रांसप्लांटेशन प्राथमिक उपचार नहीं है, लेकीन स्टेम सेल ट्रांसप्लांटेशन लिम्फोमा के लिए सुझाए गए उपचार विकल्पों में से एक है। अगर लिम्फोमा दोबारा होता है तो विशेष रूप से स्टेम सेल ट्रांसप्लांट की सिफारिश की जाती है। इस उपचार को अक्सर कीमोथेरेपी के साथ संयोजित किया जाता है, जिसका उपयोग आक्रामक कैंसर सेल्स (कोशिकाओं) को नष्ट करने के लिए किया जाता है। इस प्रक्रिया के दौरान क्षतिग्रस्त हुई बोन मैरो (अस्थि मज्जा) सेल्स (कोशिकाओं) को स्वस्थ कार्यशील सेल्स (कोशिकाओं) के साथ बदल दिया जाता है। स्टेम सेल प्रत्यारोपण के दौरान, स्वस्थ बोन मैरो (अस्थि मज्जा) सेल्स (कोशिकाओं) को मरीज़ को चढ़ाया जाता है। यह स्वस्थ बोन मैरो (अस्थि मज्जा) सेल्स (कोशिकाएं) या तो मरीज़ के बोन मैरो (अस्थि मज्जा) से (कीमोथेरेपी से ठीक पहले) या एक दाता से ली जाती है। इन दोनों में से किसी एक तरीके से इकठ्ठा की गई स्वस्थ बोन मैरो (अस्थि मज्जा) स्टेम सेल्स (कोशिकाओं) को मरीज़ के रक्तप्रवाह में डाला जाता है, जहां वे हड्डियों में जाती हैं और बोन मैरो (अस्थि मज्जा) का पुनर्निर्माण शुरू करती हैं और स्वस्थ-कार्यशील रक्त सेल्स (कोशिकाओं) के उत्पादन में मदद करती हैं।
इम्यूनोथेरेपी एक नया उपचार दृष्टिकोण है जिसे लिम्फोमा के दुर्लभ मामलों के प्रबंधन के लिए अनुशंसित किया जाता है। इम्यूनोथेरेपी का उद्देश्य लिम्फोमा सेल्स (कोशिकाओं) से लड़ने के लिए मरीज़ की प्रतिरक्षा प्रणाली को उत्तेजित करना है। इम्यूनोथेरेपी में उपयोग किए जाने वाले विशिष्ट बायोमोलेक्यूल में मोनोक्लोनल एंटीबॉडी, साइटोकिन्स और विशेष टीके शामिल हैं। लिम्फोमा के लिए सुझाए गए अन्य उपचारों में टार्गेटेड थेरेपी (लक्षित चिकित्सा), काइमेरिक एंटीजन रिसेप्टर (सीएआर)-टी सेल थेरेपी आदि शामिल हैं।
हां, लिम्फोमा का इलाज संभव हैं। लिम्फोमा के सफल प्रबंधन के लिए कीमोथेरेपी, रेडिएशन थेरेपी (विकिरण चिकित्सा), स्टेम सेल ट्रांसप्लांटेशन, इम्यूनोथेरेपी और टार्गेटेड थेरेपी (लक्षित चिकित्सा), जैसे कई उपचार विकल्प उपलब्ध हैं।
हालांकि, उन्नत चरण के लिम्फोमा की तुलना में शुरुआती चरण के लिम्फोमा का इलाज तुलनात्मक रुप से आसान होता है। दूसरे शब्दों में, प्रारंभिक पहचान दिए गए उपचार की सफलता में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। इसलिए, लिम्फ नोड्स में सूजन, खांसी, चकत्ते, सांस की तकलीफ, जोड़ों में दर्द जैसे लक्षणों को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए, खासकर अगर वे दो सप्ताह से अधिक समय तक रहते हैं।
नहीं, लिम्फोमा आनुवंशिक नहीं पाया जाता है। हालांकि, जिन लोगों के करीबी रिश्तेदार लिम्फोमा से पीड़ित हैं, उनमें इस बीमारी के विकसित होने का जोखिम तुलनात्मक रुप से अधिक होता है।
कुछ मामलों में, इलाज के कुछ साल बाद लिम्फोमा वापस आ सकता है। इसलिए, लिम्फोमा के मरीज़ों के लिए यह महत्वपूर्ण है कि वे अपनी फालो अप अपॉइंटमेंट को हमेशा जारी रखें। ये फालो अप अपॉइंटमेंट पुनरावर्तन को रोकने और प्रारंभिक अवस्था में उसका निदान करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
हालांकी लिम्फोमा को पूरी तरह से रोकने के लिए कोई ज्ञात तरीके उपलब्ध नहीं हैं, आपके लिम्फोमा के जोखिम को कम करने के कुछ तरीके हैं :
धूम्रपान विशिष्ट प्रकार के लिम्फोमा को बढ़ाने के लिए जिम्मेदार होता है। इसलिए, वयस्कों में लिम्फोमा के जोखिम को कम करने के लिए धूम्रपान छोड़ना महत्वपूर्ण है।
कुछ रसायन, जैसे फॉर्मलडिहाइड, बेंजीन, कीटनाशक, तृणनाशक आदि, आपके लिम्फोमा के जोखिम को बढ़ा सकते हैं। इन रसायनों के संपर्क में आने से बचने के लिए मास्क, चश्मे, दस्ताने और सुरक्षात्मक कपड़े पहनने पर विचार करें।